Thursday, January 17, 2013

रामायण में नारी

रामायण में नारी

रामायण एक तरफ भारत के बहुसन्ख्यक हिन्दुओं का एक प्रमुख धर्मग्रन्थ है किन्तु महर्षी वाल्मिकि रचित रामायण मे नारी का स्थान कोई सम्मान जनक प्रतीत नही होता।   बालकाण्ड मे राजा दसरथ की तीन रानिया और तीन सौ पचास उप पत्निया बता कर नारी को एक वस्तु नही तो और क्या माना गया यथा:- 

कैकेई के दासी को कुल्टा कुटिल आदि निम्न स्तर के शब्दों से संबोधित किया गया है।

राम वन गमन के समय राम द्वारा पहले अपने तीन माताओं कौशिल्या, कैकेई, और सुमित्रा की आग्या लेने के बाद 350 अन्य माताओं की ओर निहारने का उल्लेख है  - श्लोक देखिये

"त्रय शता शताधी हि द ददर्शवेक्ष्य: मातर:।

ताश्चापिस तथैवादी मात्ऋदशरथात्मजा:।। 

 (वा रा 2-39-36 व 37)

स्पष्ट है दशरथ की तीन रानियो के अलावा 350 उपपत्निया थीं  इससे इस बात से इन्कार कैसे कर सकते है कि औरतें उस बखत सिर्फ भोग्या समझी जाती रही यहा तक के स्त्रीयां दान और दहेज की वस्तुएं भी कही गयी । दान और दह्रएज मे दी जाने वाली स्त्रियों का जीवन भी कुछ को छोडकर रखैलों का सा जीवन था। राज दरबारों की बात करें तो ये विलासितापूर्ण रंगरेलियां एवं क्रीडा विनोद से परिपूर्ण होते थे। रंग शालायें क्रीडा शेल और आराम विहार जगह जगह बने हुआ करते थे। वेश्यायें थी भले ही आज जैसे बार और क्लब ना रहे हों। इनके स्थान पर राज्क्रीडागृ्ह एवं मुनियों के आश्रम हुआ करते थे जहां पर दासियों और वेश्याओं का उपयोग स्वछन्द रूप से होता था।रामायण में दसी प्रथा काजिक्र आता है युवा दासियो और रूपसी किशोरियों को विवाह आदि में दान दहेज उपहार  पुरस्कार के रूप में दिये जाते थे।

एक प्रसंग देखिये :-  जब राम द्वारा लंका विजय करके सीता व लक्ष्मण सहित अयोध्या वापस आने का समाचार हनुमान द्वारा भरत को दिया जाता है तो प्रशन्नता के साथ भरत द्वारा हनुमान जी को एक लाख गायें, सौ उत्तम गांव तथा शुभ आचरण वाली सुन्दर सोलह कन्याओं को भार्या (पत्नि) रूप मे उपहार दिया|  देखिये :-

गवांशत सहस्रं च ग्रामणां च शतंपरम्।

सकुन्डला:शुभचारा भार्या: कन्यास्तु षोडश।

(वा रा  का सर्ग 125 श्लोक 44)

एक ओर हनुमान को बाल ब्रम्हचारी बताया गया अर उस्की उसी रूप की पूजा भी करायी जाती रही वही दुसरी ओर किस प्रयोजन से हनुमान को सुन्दर रूप वाली सोलह कन्यायें पत्नि के रूप में उपहार दी गयी ? कमश:

 वाल्मिकि ने रामायण मे जगह जगह हनुमा, सुग्रीव्, बाली, अन्गद, आदि के लिये जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है वह अत्यन्त ही अमान्वीय लगते है जैसे शाखामृ्ग, हरि प्लवन्गम्, कपि आदि इन सब का अर्थ पशु बन्दर को निरुपित है हिन्दू संस्कार की बात यदि की जाय तो इनके पण्डा पुजारी पुरोहित  शंकराचार्य साधु-संन्यासी महन्त व देवि देवताओ के अराधक सभी हनुमान आदि को बन्दर रूप मे मानते है, यहा तक देश मे उत्पाद मचाते लंगुरों को भी हनुमान कहा गया। कई बार तो आदमी जैसे इनके कफन दफन तक लोग कर बैठते हैं। किसी मनुष्य की लावारिस लाश तो चिल गिद्ध कौवे के भेंट चढ जाया करते है जिसमे ऐसे कर्ताओं का मन नही पसीजता लेकिन इनकी आस्था देखिये।

इस पर गौर करने वाली बात है कि बाली, सुग्रीव, आदि की माताये पत्निया सुनर सुन्दर स्त्रीयो के रूप मे है यह विचारणीय तथ्य है कि एक ही गर्भ से कैसे बन्दर और मनुश्य दोनो पैदा हो गये नर के रूप मे वानर या बन्दर और मादा के रूप मे स्त्री वाह भई कैसी अतर्किक असमावेशी अप्राकृ्तिक है किन परिस्थियो मे बन्दरो की पत्निया नारी हुई क्या ये नारी का अपमान नही कि उनको बन्दरों की पत्नि और माता बता दिया गया।

नियोग प्रथा की तो हद तक कर दी गयी कि दशरथ की रानिया उनके चौथे पन में चार चार पुत्रो को जन्म दी इस हेतु दश्रथ ने पुत्रेष्टि यग्य़ आदि श्रृंगी ऋषि ने ऐसे क्या खीर दे दिये होंगे कि जिस पुरुष औरतों के चौथे पन याने कि 55 - 60 साल मे बच्चे नही हो सके ओ ऋषि के खीर खाने से रातों रात राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न पैदा हो गए ।राजा जनक की सुपाल्या सीता का जन्म तो अकथ कहानी है किन परिस्थितियों में कोई किसी लडकी (कन्या बच्ची) को घडे मे भन्डार कर जमीन मे गाडी गयी होगी जोकि हल चलाते वक्त किसान को मिल गयी आप खुद सोच रहे होंगे कि आज अवैध सम्बन्धों की परिणति को ही घडे मे भर कर भण्डारने की घटनाये सुनायी देती है। ये तो एक आदर्श नारी सीता का पतृ्क इतिहास है । निश्च्त रूप से सीता किसी पुरूष और महिला के शारीरिक सम्बन्धों की सन्तान होगी न कि कोई खे से उपजी हुई अलौकिक जीव।

वाल्मिकि ने बाल्काण्ड के सत्रहवें सर्ग मे तो ये भी बताया है कि ब्रह्मा , जामवन्त, बाली, सुग्रीव, गन्धमादन, गन्द , द्विविधि व हनुमान आदि की उत्पत्ति को  भी नारी के अवैध दैहिक शोषण का परिणाम है इस तरह से चाहे धार्मिक अनुष्ठानो की प्रतिपूर्ति के लिये बनाई गई व्यवस्था हो या अवैधानिक रूप से किया गया सहवास तब भी नारी पुरुषो के शोषण के शिकार थी।रामायण काल की पत्निया सेविका या दासी से इतर स्थान अर्जित नही करती पति चाहे जैसा भी हो पत्नि के लिये परम पुज्य ही थी पति की सेवा ही पत्नि का परम्   धर्म कहा। यथा :- 

व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा।

भर्तारंगानुवर्तेत साच पापगतिर्भवेत ।

भर्तु: शुश्रुषय नारी लभते स्वर्गमुत्तमम् ।।

अप्यानिर्नमस्कारा निवृ्त्ता देव पुजनात ।

सुश्रुषामेव कुर्वीत भर्तु: प्रियहिते रता।।

एष धर्म: स्त्रियो नित्यो वेदे लोकेश्रुत: स्मृ्त:।।

(अयोध्याकाण्ड सर्ग 24)  

 अर्थात " व्रत उपवास मे तत्पर पर्मोत्तम नारी भी यदि पति की सेवा नही करती तो वह पापियो ली गति को प्राप्त होती है पति सेवारत नारी य्त्तम फल को प्राप्त करती है भले ही वह देवताओ की पूजा ना करे नारी पति का प्रिय और हित का ध्यान रखकर सेवा मे लगी लहे यही स्त्री का धर्म है और वेदो और स्मृ्तियो मे ऐसा ही है ।"  

इसका ये मतलब हुआ कि पति चाहे कोई भी गलत कार्यो मे लिप्त क्यु ना हो जैसे जुआ खेलना , शराब पीना या अन्य बुरे कार्य मे लिप्त क्यू न हो स्त्री तब भी पति के हित का ध्यान रखे।

स्वर्ग नर्क भले ही कल्पना मात्र हो सकती है किन्तु रामायण मे कह दिया गया है कि स्त्री के लिये इहलोक या परलोक मे पति की सेवा ही एक मात्र आश्रय है :--

"इह्रेत्य च नारिणां पति रे को गति: सदा।"

(अयोध्याकाण्ड सर्ग 27) 

तब तो हद की पराकाष्ठा हो गयी कि सीता को लंका से लौटने पर राम द्वारा तिरस्कृ्त कर विभिन्न यातनाये दी और यहा तक कह दाला कि सिर्फ मै नही रख सकता तुम्हे जहा जाना हो चली जाओ यथा : --

यत् कर्तव्यम मनुष्येण धर्षणां प्रतिमार्जता

तत् कृ्तं रावणं हत्वा मयेदं मानकांक्षिणा।।

विदितश्चास्तु  भद्रं ते यो$यं रण परिश्रम:।

सुत्तीर्ण: सुहृ्दांवीर्याम्न त्वदर्थ मया कृ्त:।।

प्राप्त चरित्र सन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता।

दीपो नेत्रा तुरस्येव प्रतिकुलासि मे दृ्ढा ।।

तद गच्छ त्वानुंजाने$द्य यथेष्ट जनकात्मजे।

एता दश दिशो भद्रे कार्यमसित न मे त्वया।\।

रावणांक परिक्लिष्टां दृ्ष्टां दुष्टेन चक्षुष।

कथं त्वां पुनराद्याँ कुलं व्यपदिशन्महत ।

तदद्य व्याहृ्तं भद्रे कृ्ति बुद्धिना।

लक्ष्मणे वाथ भरते कुरू बुद्धिं यथा सुखं।

शत्रुघ्ने वथ सुग्रीवे राक्षसेवा विभीषणे।

निविशय मन: सीते यथा वा सुख व्रमात्मना।

नहित्वां रावणो दृ्ष्ट्वां दिद्य रूपां मनोरमाम्

मर्षयेत चिरं सीते स्वगृ्हे पर्यवस्थिताम ।।

(युद्धकाण्ड सर्ग 115) 

अर्थात " अपने तिरस्कार  का बदला लेने के लिये मनुष्य का जो भी कर्तव्य ह वह सब मैने रावण को मार कर सम्मान् की रक्षा हेतु किया है। भद्रे तुंहे विदित होना चाहिये कि मित्रो की सहायता से मैने रण मे जो विजय प्राप्त की है वह तुझे पाने के लिये नही था । तुम्हारे चरित्र मे संदेह किया जा सकता है तुम मेरे सामने खडी हो तुम मुझे निश्चित रूप से वैसे ही अप्रिय लगती हो जैसे नेर रोगियो को रोशनी । जनकात्मजा स्वतन्त्रता पुर्वक जहा चाहती हो चली जाओ । तुम्हारे लिये दसों दिशायें खुली है मुझे अब तुमसे कोई प्रयोजन नही रावण अपने अंक मे भर कर दृ्ष्टि तुम पर डाल चुका है भला महान कुल वाला तुम्हे कैसे ग्रहण कर सकता हू। भद्रे मैने अपने निश्चित विचारों के अनुसार हीकहा है। यदि तुम चाहो तो लक्ष्मण अथवा भरत के साथ रह सकती  हो। शत्रुहन, सुग्रीव या राक्षस राज विभीषण के साथ रह सकती हो तुम्हे जहा रहने मे आत्म सुख मिल सके , रह सकती हो। हे सीता तुम जैसी दिव्य रूप मनोरम नारी को अपने घर मे देख कर रावण लम्बे समय तक युमसे दूरी न रख सका होगा।"

           ये थी राम का अपनी सीता के प्रती ऐसा दुर्विचार जब सीता के संबंध मे ही ऐसी सोच उत्पन्न कर राम रोष प्रकट किया तो अन्य परिस्थियों की मारी स्त्रियों के बारे में ना जाने क्या क्या सोच उत्पन्न हुई होगी।सीता के मन मे क्या गुजरी होगी किसी भी स्त्री के लिये सबसे कष्ट प्रद स्थिति तब होती है जब उसका  पति ही उसका तिरस्कार कर दे। उसके चरित्र पर ही सवाल उठा दिये गये ये कैसा मर्यादा पुर्सोत्तम है ? 

           सीता ने इसके अलावा भी बहुत कुछ सहा पति की खुशी के लिये सीता ने राम के हाथों मैरेय भी पी लिया और निरापत्ति राम को रमण करते देखती रही। यथा :--

कुशास्तरण सत्तीर्णे रामा: सन्नीप्रसादह।

सीता मादाय हस्तेन मदु मरइकं शुचि।।

 पाययाभास काकुरस्थ:शचीमिव पुरंदर:

मासानिं च सुमृ्श्टानि फलानि विविधानि च ।।

रामास्था व्यवहार्थ किंकरा स्तुर्य माहरन्।

अपसरोरग संघायच किन्नरी परिवारिता।।

दक्षिणा रूपवत्यश्च स्त्रिय: पानवंसागता:।

उपानृ्त्यन्त काकुत्स्थं नृ्त्यगीत विशारदा:।।

मनो$भिरामा रामास्तारामो रमयतां वर:।

रमयामास धर्मात्मा नित्यं परम्भूशिता:।।

अर्थात "कुश आसन पर राम ने अपने निकट सीता को बैठा कर अपने हाथों से मीठी और पवित्र मैरेय उसी तरह पिलाई जैसे इन्द्र अपनी इन्द्राणी को पिलाते हैं। राम के उपयोगार्थ सेवक उत्तम प्रकार से उत्तम प्रकार से पकाये गये मांस और विविध प्रकार के मीटःए फल लाये। अप्सरायें नाग कन्याएं किन्नरियां तथा अन्य गुणग्य स्त्रियां (मदिरापान) नृ्त्य गीत में निपुण राम के चारो ओर करने लगी। रमण करने वालों में श्रेष्ठ राम ने मनमोहक धर्मात्मा व नित्य परम विभुषिट स्त्रियों से रमण किया। "

यहा उल्लेखित करना लाजमी होगा कि मैरेय एक उच्च कोटि की सूरा को कहते हैऔर विद्वानों ने अप्सरा शब्द का अर्थ नृ्त्यान्गना अथवा वेश्याकहा है। 

सीता का अपमान इतने पर भी न रुका, साये कि तरह पति श्री रामचन्द्र के साथ चलने वाली  और अपहृ्त होने के पश्चात लंका में प्रतिपल पति के स्मरण में डुबी रहने सीता को गर्भावस्था में राम ने निर्जन वन में मे छोड दिया और प्रचारित क्या गया कि ऐसा उन्होने न्याय के लिय अपनी प्रजा प्रियता की भावना के लिये किया। कहा गया कि राज्य का एक रजक पुरूष अपनी पत्नि को रात बह्र घर से रहने के लिये उसे प्रताडना दे रहा था कि मै राम नही हू जो लंकामें रावण के अधीन रहने वाली सीता को स्वीकार कर लू। इसी खबर को पाकर सीता को निष्कासित कर दिया।  देखिये इसमे भ्रम पनपता है कि खुद राम के मन मे सीता के प्रति पाप प्रदर्शित की 

3 comments:

  1. वाल्मीकि रामायण में माता सीता श्री राम के पीछे पीछे घूंघट मे चलने वाली सामान्य स्त्री नहीं हैं बल्कि वो श्रीराम के आगे आगे चलती हैं –

    इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ || २-५५-१२
    सीतामेवाग्रतः कृत्वा काळिन्दीम् जग्मतुर्नदीम् |
    वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड

    अर्थात : राम और लक्ष्मण यमुना नदी के किनारे पर चलने लगे और इस बार फिर माता सीता उनमें सबसे आगे चल रही थीं ।

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