हिंदुस्तान की फिजा में लाइफ में इतनी शांति और स्थिरता कभी महसूस नहीं हुई यूँ प्रतीत होता है मानो सब कुछ ठहर सा गया है। बेशक सब कुछ अपनी पटरी पे आने अभी समय कितने लगेंगे कोई नहीँ बता सकता।
खरीदी बिक्री के रेलम पेल में
न कुछ खरीदने की इच्छा न कहीं जाने की इच्छा होती।
जेब में कुछ नहीं है फिर भी कोई टेंशन नहीं एक स्तब्धता है ।
मोदी जी को कोई न तो कोस पा रहा है न दिल से धन्यवाद् कहने की हिम्मत जुटा पा रहे।
पहली बार अधिकांश हंस बोल के ब्यक्त कर रहे हैं कि उनकी जेब में एक भी पैसा नहीं है।
वरना लाचारी साफ झलकती थी।
जिनके घरों में शादी है बैचेनी उन्हें भी नहीं हो रही है। क्योंकि पता है कि इन्सल्ट करने वाला कोई नहीं है, जैसी स्थिति मेरी है वैसी स्थिति अगले की भी है।
एकाएक अल्पकालिक आभासी ही सही मानवीय एकता महसूस हो रही है यानि पूँजीपति वर्ग और मध्यम/निम्न /श्रमिक वर्ग के बीच की गहरी खाई पटी हुई सी लग रही है।
लोग एक दूसरे की मदद भी कर रहे हैं ।
एक ढाबे वाले ने बाकायदा बोर्ड पर लिखा है कि खाना खाइये और जब कभी इस रास्ते से गुजरें तो पैसा देते जाइये।
एक कहावत है "अकाल तो कट जायेगा पर बात रह जायेगी" निश्चय ही ढाबे वाले की बात भी दूर तलक जायेगी।
चोरों की चोरियां और कई अपराध थम गयी है मिडिया भी सुकून में दिख रही कि टीआरपी का टेंशन न रहा बस दिन भर में चार एटीएम की लाइव टेलीकास्ट बहुत सनसनी खबर बन रही इसके अलावा देश दुनिया की कोई अन्य खबर कोई सरोकार नहीं ।
यद्यपि खबरें तो होंगी पर कभी कैमरों की चिप से बाहर स्क्रीन पर नही आ पा रही आ रही है तो बस एक ही खबर कि आज बैंको और एटीएम में कितनी लंबी लोगो की कतारें बनी।
हाट बाजार में गाँव कस्बों में एक भी शराबी नजर नहीं आ रहे है।
मानो देश सात्विकता की ओर बढ़ रहा है।
यहाँ तक की कश्मीर में चार महीने से जो पथराव चल रहे थे वो थम से गए है।
देश में आतंकी पृष्ठ भूमि के हथियार बंद लोग लोगों की पूर्व की भांति गतिशीलता के इंतजार में पड़े लग रहे हैं।
कर्मचारी गण अपने बोस के सामने ऑफिसों में सीना तान के ये कह कर कि घन्टो एटीएम की लाइन में रहना पड़ा लेट उपस्थित हो रहे हैं। बॉस की बोलती बंद।
हॉस्पिटल से कुछ कुछ खबरे अच्छी नही आ रही कि पैंसे न देने पर इलाज नहीं किया गया ये दुःखदाई है। पर कुछ डॉक्टरों ने अपनी खिन्नता त्याग बिना पैसे भी कर्तव्य निभा रहे हैं।
बैको के आगे कतारें भले ही जितनी भी लंबी हो लेकिन उनमे उग्रता नहीं है वे खुद को तसल्ली देते नजर आ रहे है ।
कुछ लोगों का तो उज्ज्वल भविष्य भी दिख रहा कि कब अपने 2000 के बड़े नोट लोगों की जेबों और घरों बाजारों की शोभा बने कि इनका अपना पैतृक धंधा जमा खोरी रिश्वत खोरी जैसे करप्शन दिन दूना रात हजार गुना फले फुले।
कुछ तो इस बात की अपार ख़ुशी महसूस कर रहे कि पैसे वालो की ऐसी- तैसी हो गई।
कर्जदारों की आँखों में ऐसी सुकून की नींद कभी न देखी जो वे आजकल सो रहे हैं।
एक बात समझ में आ रही है कि पैंसों से हम दिखावटी जीवन जीते हैं असली जीवन आजकल जी रहे हैं जिसमे इंसान और इंसानियत हर फिजा में झलक रही है।
ये युक्ति भी अब समाज में अर्थ पा गयी है कि
"समान शील: व्यसनेसुसख्यम्" अर्थात समान गुण धर्म व्यसन और परिस्थिति वालो में मित्रता हो ही जाती है।
सारे के सारे तो सिर्फ एक ही समस्या से दो चार हो रहे हैं इस लिए न कोई छोटा न कोई बड़ा महसूस कर रहा ।
अर्थात एक 'अल्पकालिक ही सही 'समाजवाद' के दर्शन देश को उपलब्ध हुए हैं।
हरेक के जीवन में आये इस पल का आनंद लें। सब्र का बांध न तोड़े। बस एक निवेदन कि अपनी गतिशीलता को विराम न दें इंसानियत का परिचय दें एक दूसरे को ढांढस बंधाएं। और माननीय प्रधान मंत्री जी की तरफ टकटकी लगाए रख्खें कि फिर कोई नए शिगूफा से देश को एकाकार कब कर रहे हैं।
धन्यवाद।
जे के पाटले
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